जब भी बात फिक्स इंटरेस्ट की आती है तो सबसे पहले दिमाग में एफडी या फिर कोई सरकारी स्कीम आती है। एफडी में आमतौर पर 6 से 7% और सरकारी स्कीम में 7 से 8% के आसपास रिटर्न मान लिया जाता है लेकिन वहां लॉक इन की समस्या सामने आती है। ऐसे में एक बहुत सीधा और मजबूत सवाल खड़ा होता है कि क्या बिना लॉक इन के और बिना मार्केट फ्लक्चुएशन के फिक्स रिटर्न संभव है। जवाब है हां और उसी जवाब का नाम है Corporate Bonds
इस लेख में Corporate Bonds को बिल्कुल शुरुआत से लेकर अंत तक डिटेल में समझा जाएगा। यहां रिस्क की भी पूरी बात होगी इंटरेस्ट की भी और कंपाउंड इंटरेस्ट का पूरा खेल भी। लेख पढ़ते हुए आपको हर स्टेप पर यह साफ लगेगा कि यह एक पूरा और लॉजिकल एक्सप्लनेशन है जिसे समझने के बाद कोई कन्फ्यूजन नहीं बचेगा।
Corporate Bonds को समझने से पहले जरूरी बातें
जब हम हाई रिटर्न की बात करते हैं तो सबसे पहले यह समझना जरूरी हो जाता है कि रिस्क क्या है। इसके बाद Corporate Bonds का पूरा कॉन्सेप्ट समझना जरूरी है। फिर इसका कंपैरिजन एफडी से और म्यूचुअल फंड से किया जाएगा। टैक्सेशन भी समझा जाएगा और आखिर में यह भी कि Corporate Bonds कैसे चुने जाते हैं और उनमें इन्वेस्ट कैसे किया जाता है।
Corporate Bonds क्या होते हैं
Corporate Bonds असल में किसी कंपनी को दिया गया लोन होता है। जब किसी बड़ी कंपनी को पैसों की जरूरत पड़ती है तो उसके पास दो रास्ते होते हैं। पहला रास्ता बैंक से लोन लेना और दूसरा रास्ता बॉन्ड इशू करना। बैंक से लोन लेने पर कंपनियों को बहुत महंगे ब्याज पर पैसा मिलता है। कई बार यह ब्याज 20 से 35% तक भी हो सकता है। इसी वजह से बड़ी कंपनियां बॉन्ड इशू करना ज्यादा पसंद करती हैं।
बॉन्ड का मतलब होता है एक ऐसा डॉक्यूमेंट जिसमें कंपनी यह लिखकर देती है कि जो भी इन्वेस्ट करेगा उसे कितने प्रतिशत का फिक्स रिटर्न मिलेगा। उदाहरण के तौर पर अगर को किसी नए प्लांट या नए वेंचर के लिए 1000 करोड़ की जरूरत है तो वह बैंक से लोन लेने की जगह बॉन्ड इशू कर सकती है। इन्वेस्टर अपनी क्षमता के हिसाब से जैसे ₹10000 का बॉन्ड खरीद लेता है। इसका मतलब यह हुआ कि आपने कंपनी को ₹10000 उधार दे दिए। इसके बदले कंपनी आपको हर साल इंटरेस्ट देती है और मैच्योरिटी पर पूरा पैसा वापस कर देती है।
मैच्योरिटी क्या होती है
जब भी आप किसी को पैसा उधार देते हैं तो वह एक तय समय के लिए होता है। उसी तय समय को मैच्योरिटी कहा जाता है। अगर बॉन्ड 5 साल का है तो इसका मतलब है कि 5 साल तक आपको इंटरेस्ट मिलता रहेगा और 5 साल पूरे होने पर आपका पूरा पैसा वापस मिल जाएगा।
लॉक इन और लिक्विडिटी
Corporate Bonds में एफडी की तरह लॉक इन नहीं होता। अगर बीच में पैसों की जरूरत पड़ जाए तो एक बटन क्लिक करके बॉन्ड बेचा जा सकता है। न कोई पेनल्टी न कोई फाइन।
Corporate Bonds में इन्वेस्ट करने से पहले क्या देखना चाहिए
Credit Rating क्यों जरूरी है
सबसे पहली और सबसे जरूरी चीज होती है Credit Rating। मार्केट में कुछ एजेंसियां होती हैं जो बॉन्ड की रेटिंग करती हैं जैसे क्रिसिल इक्रा केयर और इंडिया रेटिंग। रेटिंग का मतलब यह होता है कि कंपनी कितनी भरोसेमंद है।
| Rating | Risk Level |
|---|---|
| AAA | सबसे ज्यादा सुरक्षित |
| AA | बहुत सुरक्षित |
| A | थोड़ा ध्यान जरूरी |
| BBB | रिस्क मौजूद |
| BB | बहुत ज्यादा रिस्क |
| D | पैसा डूबने की संभावना |
AAA रेटेड बॉन्ड सबसे सुरक्षित माने जाते हैं लेकिन इनमें रिटर्न थोड़ा कम होता है। जैसे जैसे रेटिंग नीचे जाती है रिस्क बढ़ता है और रिटर्न भी बढ़ता है।
Yield To Maturity क्या होता है
Yield To Maturity जिसे YTM भी कहा जाता है यह बताता है कि अगर बॉन्ड को मैच्योरिटी तक रखा जाए तो कुल कितना रिटर्न मिलेगा। इसलिए बॉन्ड चुनते समय YTM देखना बहुत जरूरी है।
Maturity Period और Liquidity
बॉन्ड कितने साल का है यह देखना जरूरी है। 2 साल 5 साल या 10 साल का बॉन्ड हो सकता है। साथ ही यह भी देखना जरूरी है कि बॉन्ड लिस्टेड है या अनलिस्टेड। NSE या BSE पर लिस्टेड बॉन्ड में लिक्विडिटी ज्यादा होती है और कभी भी बेचा जा सकता है।
Corporate Bonds के प्रकार
Secured Bonds
Secured Bonds में कंपनी अपने किसी एसेट को गिरवी रखती है जैसे प्रॉपर्टी या मशीनरी। अगर कंपनी डिफॉल्ट करती है तो उस एसेट को बेचकर इन्वेस्टर्स को पैसा दिया जाता है। इनमें इंटरेस्ट थोड़ा कम होता है लेकिन सेफ्टी ज्यादा होती है।
Unsecured Bonds
Unsecured Bonds में कोई एसेट गिरवी नहीं होता। अगर कंपनी डिफॉल्ट करती है तो रिस्क ज्यादा होता है। इसी वजह से इनमें इंटरेस्ट बहुत ज्यादा मिलता है जैसे 14 से 16% तक। यह तभी लेने चाहिए जब कंपनी बहुत मजबूत हो।
कंपनी की Financial Health कैसे चेक करें
किसी भी Corporate Bond में इन्वेस्ट करने से पहले कंपनी की हेल्थ देखना जरूरी है।
- कंपनी प्रॉफिट में है या नहीं
- कंपनी पर लोन कितना है
- Debt To Equity Ratio
अगर Debt To Equity Ratio दो से कम है तो कंपनी सेफ जोन में मानी जाती है।
Corporate Bonds किन लोगों के लिए सही हैं
Corporate Bonds उन लोगों के लिए सही हैं जिन्हें रेगुलर इनकम चाहिए। रिटायर्ड लोग होम मेकर्स और सीनियर सिटीजन जिनको हर महीने फिक्स इंटरेस्ट चाहिए उनके लिए यह अच्छा ऑप्शन है। जो लोग एफडी से ज्यादा रिटर्न चाहते हैं लेकिन स्टॉक मार्केट का रिस्क नहीं लेना चाहते उनके लिए भी Corporate Bonds सही हैं। जो लोग अपना पोर्टफोलियो डाइवर्सिफाई करना चाहते हैं उनके लिए भी यह एक अच्छा ऑप्शन है।
Simple Interest और Compound Interest का फर्क
आमतौर पर Corporate Bonds सिंपल इंटरेस्ट देते हैं। सिंपल इंटरेस्ट का मतलब है कि जो इंटरेस्ट मिलता है वह सीधे बैंक अकाउंट में चला जाता है। Compound Interest तब बनता है जब उस इंटरेस्ट को फिर से इन्वेस्ट किया जाए।
Step By Step: Simple Interest को Compound कैसे बनाएं
स्टेप 1: इंटरेस्ट को दोबारा बॉन्ड में लगाना
अगर ₹1 लाख पर 12% से ₹12000 इंटरेस्ट मिला तो उस ₹12000 से नया बॉन्ड खरीद लिया जाए।
स्टेप 2: कैपिटल बढ़ाना
पहले साल के बाद कैपिटल ₹1,12,000 हो जाता है।
स्टेप 3: दूसरे साल ज्यादा इंटरेस्ट
अब 12% से ₹13,400 के आसपास इंटरेस्ट बनता है।
स्टेप 4: इंटरेस्ट पर इंटरेस्ट
हर साल इंटरेस्ट बढ़ता जाता है क्योंकि कैपिटल बढ़ता जाता है।
स्टेप 5: लॉन्ग टर्म में बड़ा फर्क
सिंपल इंटरेस्ट में जहां लगभग 6 लाख बनते हैं वहीं कंपाउंडिंग से 7.5 से 8 लाख तक बन सकते हैं।
दूसरा तरीका: SIP के जरिए Compound Interest
अगर हर महीने ₹10000 इंटरेस्ट मिलता है तो उस ₹10000 की SIP शुरू कर दी जाए। लॉन्ग टर्म में 11% CAGR मान लिया जाए और 10 साल तक SIP चले तो बॉन्ड का पैसा सेफ रहता है और म्यूचुअल फंड से एक्स्ट्रा वेल्थ बनती है।
उम्र के हिसाब से Strategy
- जवान लोग इंटरेस्ट को इक्विटी म्यूचुअल फंड में डाल सकते हैं
- 40 से 45 की उम्र वाले हाइब्रिड या इंडेक्स फंड चुन सकते हैं
- 60 प्लस उम्र वाले लोग RD या लिक्विड ऑप्शन चुन सकते हैं
Corporate Bonds vs FD vs Mutual Fund
| Point | Fixed Deposit | Corporate Bonds | Mutual Funds |
|---|---|---|---|
| Expected Return | 5 से 7% | 10 से 13% | 8 से 15% |
| Return Guarantee | पूरी | इंटरेस्ट फिक्स | कोई गारंटी नहीं |
| Risk | बहुत कम | मीडियम | लो से वेरी हाई |
| Regular Income | हां | हां | ज्यादातर नहीं |
| Capital Safety | बहुत हाई | रेटिंग पर निर्भर | मार्केट पर निर्भर |
Corporate Bonds का Taxation
मैच्योरिटी पर मिलने वाले प्रिंसिपल अमाउंट पर कोई टैक्स नहीं लगता।
टैक्स सिर्फ इंटरेस्ट पर लगता है।
- इंटरेस्ट इनकम टैक्स स्लैब के हिसाब से टैक्सेबल होता है
- ₹5000 से ज्यादा इंटरेस्ट पर 10% TDS लगता है जो ITR फाइल करते समय वापस मिल जाता है
अगर मैच्योरिटी से पहले बॉन्ड बेचा जाता है तो टैक्स लिस्टेड और अनलिस्टेड बॉन्ड के हिसाब से अलग अलग लगता है।
Conclusion
Corporate Bonds एक ऐसा इन्वेस्टमेंट ऑप्शन है जिसमें फिक्स इंटरेस्ट कैपिटल सेफ्टी और बेहतर रिटर्न तीनों का बैलेंस मिलता है। सही रेटिंग सही कंपनी और सही स्ट्रेटजी के साथ Corporate Bonds को समझदारी से चुना जाए तो यह एफडी और म्यूचुअल फंड के बीच एक मजबूत विकल्प बन सकता है।












