इन्वेस्टर का काम होता है पैसे से पैसा कमाना। लेकिन हर इन्वेस्टर एक जैसा नहीं होता। कोई ऐसा होता है जो कहता है कि जैसे भी हो मोटा पैसा आना चाहिए मोटी रिटर्न चाहिए चाहे कितना भी रिस्क क्यों न लेना पड़े। उसे फर्क नहीं पड़ता कि बाजार ऊपर जाए या नीचे जाए। दूसरी तरफ एक ऐसा इन्वेस्टर होता है जो कहता है कि दो पैसे कम कमा लेंगे लेकिन टेंशन नहीं चाहिए और सबसे जरूरी बात पैसा डूबना नहीं चाहिए। तो Return on FD
यही से निवेश की दो कैटेगरी बनती हैं। एक रिस्क टेकर और दूसरी रिस्क अवर्स। रिस्क लेने वाली कैटेगरी में शेयर मार्केट और म्यूचुअल फंड जैसे ऑप्शन आते हैं। आज के समय में तो शेयर मार्केट के पीछे पूरा जमाना दीवाना है। हर कोई स्टॉक मार्केट में पैसे ठोक रहा है। लेकिन चाहे आप कितने ही बड़े रिस्क टेकर क्यों न हों अगर आपके पास 1 रुपये हैं तो 10-20 रुपये सेफ एसेट में रखना जरूरी होता है। वहीं जो सेफ इन्वेस्टर होता है वह उल्टा करता है। वह कहता है कि 70-75 प्रतिशत पैसा सेफ रखेंगे और बाकी से रिस्क लेंगे। लेकिन चाहे सेफ वाला हो या रिस्क वाला सेफ इन्वेस्टमेंट में इन्वेस्ट करना सबके लिए जरूरी है।
यही वजह है कि सेफेस्ट इन्वेस्टमेंट इंस्ट्रूमेंट का राजा माना जाता है एफडी यानी फिक्स्ड डिपॉजिट। जैसे किशोर कुमार मुकेश और रफी के गाने पहले भी हिट थे आज भी हैं और आगे भी रहेंगे वैसे ही एफडी दादाजी के टाइम पर भी हिट थी पिताजी के टाइम पर भी और आपके और आपके बच्चों के टाइम पर भी हिट रहने वाली है।
इस पूरे आर्टिकल में वही सब कुछ विस्तार से बताया गया है जो वीडियो स्क्रिप्ट में बताया गया है ताकि आपको पूरी तरह से क्लियर हो जाए कि एफडी किसको करवानी चाहिए कितनी करवानी चाहिए कौन सी एफडी करनी चाहिए कितने टाइप की एफडी होती है कैसे करवाते हैं इसमें क्या झंझट होते हैं किन बातों का ध्यान रखना चाहिए और कैसे Return on FD को मैक्सिमाइज किया जा सकता है।
एफडी क्या होती है
एफडी का मतलब होता है फिक्स्ड डिपॉजिट। यानी वह पैसा जो आप बैंक में एक फिक्स्ड समय के लिए जमा करते हैं उसे एफडी कहा जाता है। यह असल में ऐसा पैसा होता है जो आप बैंक को लोन देते हैं। बैंक आपको पहले से बता देता है कि आपने अगर इस रेट पर इतने साल के लिए पैसा जमा किया है तो मैच्योरिटी पर आपको कितना पैसा मिलेगा।
एफडी को रिस्क फ्री इसलिए कहा जाता है क्योंकि इसमें ऊपर नीचे नहीं होता। एक बार आपने एफडी खोल दी और बैंक ने रेट बता दिया तो तय समय के बाद वही पैसा मिलता है। चाहे दुनिया इधर की उधर हो जाए बैंक तय समय पर वही अमाउंट देता है।
अगर बैंक बंद भी हो जाए तो भी घबराने की जरूरत नहीं होती क्योंकि 5 लाख रुपये तक की एफडी पर आरबीआई की गारंटी होती है। यानी बैंक बंद होने की स्थिति में भी 5 लाख रुपये तक का पैसा सुरक्षित रहता है।
एफडी किसको करवानी चाहिए
एफडी हर किसी के लिए जरूरी है लेकिन कुछ खास स्थितियों में एफडी करवाना और भी जरूरी हो जाता है।
रिस्क अवर्स इन्वेस्टर के लिए
अगर आप ऐसे इंसान हैं कि आपने कहीं 1 लाख रुपये लगाए और अगर वह एक रात में 95 हजार हो जाए तो आपकी नींद उड़ जाए तो फिर एफडी आपके लिए है। ऐसे लोग शेयर मार्केट की वोलेटिलिटी झेल नहीं सकते।
शॉर्ट टर्म जरूरत के लिए
अगर आपको पता है कि थोड़े समय में आपको पैसों की जरूरत पड़ेगी तो एफडी सबसे सही ऑप्शन है। मान लीजिए आपको 6 महीने बाद गाड़ी खरीदनी है या कुछ महीनों बाद शादी या कोई बड़ा खर्च है तो उस पैसे को शेयर मार्केट या म्यूचुअल फंड में डालना रिस्क भरा हो सकता है। एफडी में पैसा सुरक्षित रहता है और कुछ रिटर्न भी मिल जाता है।
इमरजेंसी फंड के लिए
इमरजेंसी फंड बनाना फाइनेंशियल डिसिप्लिन का बेसिक है। अगर आपका महीने का खर्च मान लीजिए 50 हजार रुपये है तो कम से कम 6 महीने का खर्च यानी 3 लाख रुपये आपको हमेशा सेफ रखकर चलना चाहिए। इस पैसे को एफडी में रखना सही रहता है क्योंकि जरूरत पड़ने पर यह पैसा सुरक्षित रहता है।
पार्किंग के लिए
अगर आपके पास पैसा है लेकिन आप किसी सही मौके का इंतजार कर रहे हैं जैसे बाजार नीचे आने का या घर खरीदने का फैसला लेने का तो उस समय पैसे को एफडी में पार्क करना समझदारी होती है। आप 7 दिन से लेकर कुछ महीनों की एफडी कर सकते हैं और जैसे ही जरूरत पड़े पैसा निकाल सकते हैं।
सीनियर सिटीजन के लिए
60 साल के बाद या रिटायरमेंट के बाद रिस्क लेने का समय नहीं होता। इस उम्र में एफडी करवाकर ब्याज की इनकम लेना ज्यादा सही रहता है।
युवा इन्वेस्टर के लिए
युवा अगर शेयर मार्केट या म्यूचुअल फंड में निवेश कर रहे हैं तो कर सकते हैं लेकिन पूरा पैसा रिस्क में डालना सही नहीं है। पोर्टफोलियो में बैलेंस रखना जरूरी है।
एफडी कहां नहीं करानी चाहिए
अगर आपका लक्ष्य बहुत लंबा है जैसे 15-20 साल बाद का कोई बड़ा खर्च तो उस स्थिति में एफडी उतनी सूटेबल नहीं होती। ऐसे लक्ष्यों के लिए शेयर मार्केट म्यूचुअल फंड गोल्ड या रियल एस्टेट जैसे ऑप्शन पर रिसर्च करके विचार किया जा सकता है।
एफडी कब से शुरू करनी चाहिए
सबसे पहले इमरजेंसी फंड बनाना चाहिए और उसे एफडी में रखना चाहिए। उसके बाद रिस्की एसेट्स में निवेश किया जा सकता है।
एफडी कैसे करवाएं
एफडी करवाने के तीन तरीके होते हैं।
पहला तरीका आलसी तरीका
जिस बैंक में आपका पहले से अकाउंट है उसी बैंक में जाकर मैनेजर से एफडी करवा देना। इसमें दिक्कत यह होती है कि जरूरी नहीं उस बैंक में उस समय सबसे अच्छा Return on FD मिल रहा हो।
दूसरा तरीका मेहनत वाला तरीका
हर बैंक में जाकर रेट पूछना पब्लिक बैंक प्राइवेट बैंक एनबीएफसी कोऑपरेटिव बैंक सब जगह से रेट लेकर तुलना करना। इसमें समय और मेहनत दोनों ज्यादा लगते हैं।
तीसरा तरीका स्मार्ट तरीका
स्टेबल मनी ऐप के जरिए एफडी करना। इसमें आप 200 से ज्यादा बैंकों की एफडी को कंपेयर कर सकते हैं और बिना नया बैंक अकाउंट खोले सिर्फ 3 मिनट में एफडी कर सकते हैं। यह ऐप सिर्फ एक फैसिलिटेटर है पैसा सीधे आपके बैंक से चुने हुए बैंक में जाता है।
एफडी के लिए बैंक कैसे चुनें
एफडी के लिए चार ऑप्शन होते हैं। शेड्यूल कमर्शियल बैंक कोऑपरेटिव बैंक एनबीएफसी और कॉर्पोरेट टर्म डिपॉजिट। एनबीएफसी और कॉर्पोरेट डिपॉजिट में 5 लाख की आरबीआई गारंटी नहीं होती इसलिए इन्हें अवॉयड करना बेहतर है। कोऑपरेटिव बैंक में भी रिस्क रहता है इसलिए सबसे सुरक्षित ऑप्शन शेड्यूल कमर्शियल बैंक होते हैं जहां 5 लाख तक की गारंटी मिलती है।
टेनर कैसे चुनें
एफडी का टेनर आपकी जरूरत पर निर्भर करता है। अगर आपको 3 महीने बाद पैसे की जरूरत है तो 3 महीने की एफडी करिए। अगर इमरजेंसी फंड है तो 1-2 साल के रोटेशन में रख सकते हैं।
कई बार 12 महीने और 13 महीने की एफडी में रेट का फर्क होता है। अगर थोड़ा सा टेनर बढ़ाने पर ज्यादा Return on FD मिल रहा है तो उसे चुनना समझदारी होती है।
एफडी में ब्याज कैसे मिलता है
एफडी दो तरह की होती है।
सिंपल एफडी
इसमें हर साल का ब्याज आपके खाते में आ जाता है और मूल राशि वही रहती है।
कंपाउंडिंग एफडी
इसमें ब्याज मूल राशि में जुड़ जाता है और अगले साल उस पर ब्याज मिलता है। यह कंपाउंडिंग सालाना तिमाही या मासिक हो सकती है। जितनी ज्यादा बार कंपाउंडिंग होती है उतना ज्यादा फायदा होता है।
एफडी तोड़ने पर क्या होता है
अगर आपने लंबी अवधि की एफडी कराई और बीच में पैसे की जरूरत पड़ गई तो एफडी तोड़ी जा सकती है लेकिन उस पर पेनल्टी लगती है। पेनल्टी आमतौर पर आधा प्रतिशत से 2 प्रतिशत तक हो सकती है और बैंक कम अवधि के रेट से ब्याज कैलकुलेट करता है। कुछ मामलों में अगर एफडी स्टेबल मनी के जरिए की गई है और बैंक की शर्तों के अनुसार है तो पेनल्टी नहीं भी लगती।
निष्कर्ष
एफडी क्या होती है एफडी कब करानी चाहिए एफडी किसको करानी चाहिए एफडी कैसे करानी चाहिए एफडी के टाइप क्या होते हैं और किन बातों का ध्यान रखना चाहिए यह सब कुछ विस्तार से कवर किया गया है। एफडी को अगर एक लाइन में समझा जाए तो एफडी है मन की शांति। सही समय सही टेनर और सही बैंक चुनकर एफडी करने से Return on FD को सुरक्षित तरीके से बेहतर बनाया जा सकता है।











